हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार , रहबर ए मोअज़्ज़म-ए-इंक़ेलाब हज़रत आयतुल्लाहिल उज़मा ख़ामनाई ने इमामे ज़मानؑ के ज़ुहूर के लिए रोज़े की नज़र” से मुतअल्लिक़ एक इस्तिफ़ता का जवाब दिया है, जिसे क़ारीन की ख़िदमत में पेश किया जा रहा है।
इमामे ज़मानؑ अ.स.के ज़ुहूर के लिए रोज़े की नज़र:
सवाल : अगर इमाम ए ज़माना के ज़ुहूर के लिए तीन दिन के रोज़ों की नज़र मानी जाए, तो क्या यह नज़र सहीह है, या नज़र का किसी हाजत के पूरा होने से मशरूत होना ज़रूरी है?
जवाब : अगर नज़र मुक़र्रर शरई सिग़े के साथ अदा की जाए, तो उस पर अमल करना वाजिब है, और उसकी ख़िलाफ़वर्ज़ी की सूरत में कफ़्फ़ारा लाज़िम आता है चाहे नज़र किसी शर्त या हाजत के पूरा होने से मशरूत हो या बग़ैर किसी शर्त के हो।
नज़र का शरई सिग़ा यह है:
«لِلّٰہِ عَلَیَّ أَنْ أَفْعَلَ کَذَا…»
यानी: “अल्लाह के लिए मेरे ज़िम्मे है कि मैं फलाँ काम अंजाम दूँ।
इसी तरह अगर कोई शख़्स यह कहे:
मैं ख़ुदा के लिए नज़र करता हूँ कि फलाँ काम अंजाम दूँ
तो बनाबर-ए-एहतियाते वाजिब उस नज़र पर अमल करना ज़रूरी है।
लेकिन सिर्फ़ यह कहना कि:मैं नज़र करता हूँ”,
शरई नज़र के तहक़्क़ुक़ के लिए काफ़ी नहीं है।
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